भौगोलिक स्थिति

ज्वालपा उत्तराखंड के पौड़ी जिले के अंतर्गत कफोलस्यूं पट्टी में ज्वालपासेरा में स्थित है। कोटद्वार रेलवे स्टेशन से कोटद्वार-पौडी राष्ट्रीय राजमार्ग पर 73 कि. मी. और सतपुली से पौड़ी की ओर 22 कि. मी. पर स्थित है।

पौराणिक महत्व

स्कंद पुराण में केदारखण्ड के अध्याय 168 में एक कथा है कि पूर्वकाल में दैत्यराज पुलोम की पुत्री शची ने आकाशमार्ग से जाते हुए एक मनोहर युवक को देखा। जिसकी छवि को शची ने धारण कर इसी मध्य नारद जी आते दिखाई दिए। शची ने नारद जी के पास जाकर अपने मन की बात बताई। नारद जी ने बताया आपने देवराज इंद्र को अपने पति के रूप में देखा। देवराज इंद्र का मिलना इस क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी पार्वती की तपस्या के फलस्वरूप, देवी पार्वती के वरदान मिलने पर ही संभव है। शची की घोर तपस्या के बाद देवी पार्वती ज्याला रूप में प्रकट हुई। आकाशवाणी सुनाई दी। शची, मांगो तुम्हे क्या वरदान चाहिए? शची ने कहा मुझे पति के रूप में इंद्र चाहिए। देवी ने कहा एवमस्तु। कालांतर में शची का विवाह देवराज इंद्र से हुआ। यह परंपरा आज भी है। विवाह योग्य युवतियां मन वांछित पति की कामना से मां ज्वालपा के दरबार में आकर मन्नत मांगती हैं। ज्वालपा सेरा में देवी का मंदिर गढ़वाल नरेश प्रद्युम्न शाह के शासन काल से पहले बन चुका था। राजा प्रद्युम्न शाह ने 33% नाली सरकारी जमीन ज्वालपासेरा को अर्पित की थी।

संस्था की आवश्यकता

वर्ष 1969 से पहले ज्वालपा धाम में कोई नियमित संस्था या संगठन नहीं था। कोई सुविधाऐं नहीं थी। मां ज्वालपा के कुछ भक्तों ने, जिनमें श्री सुरेशानंद जी थपलियाल (मासी), श्री धर्मानंद जी थपलियाल (सिमतोली), नारायण दत्त जी थपलियाल (खैड़), और उर्वी दत्त जी थपलियाल (ईडा) के सामूहिक चिंतन से एक समिति बनाने पर विचार हुआ।

विक्रम संवत 2026 के कार्तिक माह की 3 गते तदुनसार, 19 अक्टूबर 1969 के दिन श्री ज्वालपा देवी मंदिर समिति, पौड़ी गढ़वाल की स्थापना की। इस सम्मेलन की अध्यक्षता ग्राम पालकोट निवासी श्री सत्य प्रसाद थपलियाल जी ने की थी। इस कार्यकारिणी में निम्नलिखित पदाधिकारियों का चयन आम सभा द्वारा किया गया था। नारायणदत्त जी थपलियाल प्रधान, सत्य प्रसाद जी थपलियाल मंत्री चुने गए। इनके अलावा सच्चिदानंद जी अणथ्वाल, थपलियाल उपाध्यक्ष, भैरव दत्त जी अणथ्वाल-कोषाध्यक्ष, धर्मानंद जी गणेश मणि जी अणथ्वाल, उर्वी दत्त जी थपलियाल, उमाकांत जी थपलियाल, ठाकुर सिंह बिष्ट, वचन सिंह बिष्ट और जयकृत सिंह बिष्ट जी सदस्य चुने गए। बाद में श्री ज्वालपा देवी मंदिर समित्ति गढ़वाल का पंजीकरण करवा लिया गया। पंजीयन सं. 307/1-24482 दिनांकित 25/05/1971 है।

जनश्रुति यह भी है कि उस काल में जब नजीबाबाद से लोग ढाकर लाते थे तब एक व्यक्ति के नमक के बोरे में लोड़ी (पाषाण पिंडी) के रूप में ज्वालपा देवी आई जिसने इस स्थान पर मंदिर बनाने की इच्छा प्रकट की थी। थपलियाल जाति के ब्राह्मण ज्वालपा देवी के मूल पुजारी थे।

समिति के उद्देश्य

ज्वालपा देवी में आस्थावान श्रद्धालुओं को संगठित करना, उनके लिए पूजा और यात्री सुविधाओं को बढ़ाना।

संतों और विद्वानों द्वारा प्रवचन, संकीर्तन तथा अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देना।

गुरुकुल पद्धति सम संस्कृत शिक्षा व्यवस्था व वैदिक ज्ञान एवं दर्शन का आधुनिकीकरण कर उसे वैश्विक बनाना और अन्य भाषाओं को भी बढ़ावा देना।

श्री ज्वालपादेवी सिद्धपीठ पूजा समिति

ज्वालपा धाम में सन 2000 तक सभी तरह के प्रबंधकीय कार्यों के लिए एक ही समिति थी। जिसका नाम श्री ज्वालपादेवी मंदिर समिति, पौड़ी गढ़वाल था। इस समिति में श्रद्धालु वर्ग और पुजारी वर्ग सहित समाज की सभी जातियों के लोग थे जो कि अभी भी श्री ज्वालपादेवी समिति के नाम से यथावत संचालित है। पूजा समिति के अणथ्वाल बंधु सन 2000 तक मंदिर समिति में थे। इसके उपरान्त अणथ्वाल बंधुओं ने मंदिर समिति से अलग होकर वर्ष 2000 में श्री ज्वालपा देवी सिद्ध पीठ पूजा समिति बना ली। अणथ्वाल बंधुओं की ज्वालपा मंदिर में पारिवारिक बारी लगती है और मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा जो चढ़ावा दिया जाता है उसे अणथ्वाल पुजारी, जिस दिन जिसकी बारी होती वह पुजारी अपने घर ले जाता है। चढ़ावे का एक पैसा भी मंदिर समिति को नहीं मिलता।

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